ज़ेन महायान बौद्ध धर्म की एक शाखा है जो ध्यान को अपना मुख्य अभ्यास और प्रत्यक्ष अंतर्दृष्टि को अपना लक्ष्य मानती है। इसकी उत्पत्ति चीन में चान के रूप में हुई, फिर यह जापान पहुंचा जहां यह ज़ेन नाम से फला-फूला और तब से यह विश्व भर में फैल चुका है।
इस परंपरा की उत्पत्ति बुद्ध द्वारा महाकश्यप को बिना शब्दों के धर्म का उपदेश देने और बोधिधर्म के चीन आगमन की पौराणिक कथा से मानी जाती है। ऐतिहासिक विकास अधिक जटिल है, जिसमें भारतीय ध्यान तकनीकों और चीनी संस्कृति तथा दाओवादी संवेदनाओं का अंतर्संबंध शामिल है। जापान में इसकी दो प्रमुख शाखाएँ उभरीं: रिंझाई, जो ज्ञान प्राप्ति के लिए कोआन नामक विरोधाभासी पहेलियों का उपयोग करती है, और सोतो, जो किसी विशेष अवस्था के लिए जानबूझकर प्रयास किए बिना, शिकंताज़ा यानी "बस बैठना" पर ज़ोर देती है।
ज़ेन प्रशिक्षण बहुत ही संयमी होता है। लंबे समय तक बैठकर ध्यान करना, शारीरिक मुद्रा और श्वास पर ध्यान देना, और गुरु का मार्गदर्शन ही इसके सामान्य साधन हैं। ज्ञानोदय को अपने सच्चे स्वरूप की अचानक पहचान के रूप में वर्णित किया गया है, जो पहले से ही पूर्ण है। कला रूप—स्याही चित्रकला, सुलेख, बागवानी, चाय समारोह—दैनिक गतिविधियों में उसी अंतर्दृष्टि को व्यक्त करने का माध्यम बन गए।
ज़ेन दर्शन जटिल सिद्धांतों और शाब्दिक व्याख्याओं पर भरोसा नहीं करता। इसका उद्देश्य चंद्रमा के बारे में बात करना नहीं, बल्कि उसे देखना है।
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