प्रश्न पूछना एक ऐसी भ्रांति है जिसमें आधार वाक्य निष्कर्ष की सत्यता को मान लेता है। यह तर्क एक चक्र में घूमता है। यह उस बात को मान लेता है जिसे वह सिद्ध करने का प्रयास कर रहा है। निष्कर्ष आधार वाक्य में ही छिपा होता है। यह तर्क वैध तो है लेकिन निरर्थक है। यह कोई नई जानकारी नहीं देता।
इसका सर्वमान्य उदाहरण: ईश्वर का अस्तित्व है क्योंकि बाइबल ऐसा कहती है, और बाइबल ईश्वर का वचन है। आधार वाक्य ही निष्कर्ष को पूर्वकल्पित करता है। यह तर्क चक्रीय है। एक अन्य उदाहरण: यह पुस्तक सत्य है क्योंकि इसमें सत्य होने का दावा किया गया है। आधार वाक्य ही निष्कर्ष को पूर्वकल्पित करता है। यह तर्क कुछ भी सिद्ध नहीं करता।
प्रश्न पूछने के उदाहरण
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बिना हम खुलकर बोल नहीं सकते।
- वह भरोसेमंद है क्योंकि वह हमेशा सच बोलता है।
- यह दवा कारगर है क्योंकि यह प्रभावी है।
- कानून न्यायसंगत इसलिए है क्योंकि वह कानूनी है।
- मैं एक अच्छा इंसान हूँ क्योंकि मैं अच्छे काम करता हूँ।
प्रश्नवाचक तर्क को कभी-कभी चक्रीय तर्क भी कहा जाता है। इन दोनों शब्दों का प्रयोग अक्सर एक दूसरे के स्थान पर किया जाता है। वास्तव में, प्रश्नवाचक तर्क एक व्यापक श्रेणी है। इसमें कोई भी ऐसा तर्क शामिल है जिसमें आधार वाक्य निष्कर्ष को ही मान लेता है। चक्रीय तर्क एक विशिष्ट प्रकार का तर्क है जिसमें निष्कर्ष को ही आधार वाक्य के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह अंतर सूक्ष्म है। यह भ्रांति रोजमर्रा के तर्कों में आम है। लोग जो सिद्ध करने का प्रयास कर रहे होते हैं, उसे मान लेते हैं। उन्हें यह एहसास नहीं होता कि उनका तर्क चक्रीय है। इसका उपाय यह है कि पूछा जाए: आधार वाक्य को कौन से प्रमाण समर्थन देते हैं? यदि आधार वाक्य केवल निष्कर्ष का पुनरावलोकन है, तो तर्क विफल हो जाता है। यह एक बंद चक्र है। इसका कोई निष्कर्ष नहीं निकलता। प्रश्न का उत्तर नहीं दिया जाता, बल्कि प्रश्नवाचक तर्क ही पूछा जाता है।
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