मरुस्थलीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा उपजाऊ भूमि मरुस्थल में बदल जाती है। यह तब होता है जब मिट्टी पौधों को सहारा देने की अपनी क्षमता खो देती है। सूखा, अत्यधिक चराई, वनों की कटाई और अपर्याप्त सिंचाई इसके कारक हैं। जलवायु परिवर्तन इसे और भी बदतर बना देता है। यह आवश्यक नहीं है कि भूमि मरुस्थल के पास ही हो। यह किसी भी क्षेत्र की शुष्क भूमि हो सकती है।
इसके परिणाम मानवीय और पर्यावरणीय दोनों ही हैं। किसान अपनी आजीविका खो देते हैं। खाद्य आपूर्ति कम हो जाती है। लोग शहरों की ओर या सीमा पार पलायन करने लगते हैं। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि मरुस्थलीकरण 100 से अधिक देशों को प्रभावित करता है और एक अरब से अधिक लोगों की आजीविका को खतरे में डालता है। अफ्रीका का साहेल क्षेत्र इसका प्रमुख केंद्र है।
समाधान मौजूद हैं। ग्रेट ग्रीन वॉल का लक्ष्य 2030 तक पूरे अफ्रीका में 10 करोड़ हेक्टेयर बंजर भूमि को पुनर्स्थापित करना है। सीढ़ीदार खेती, सूखा प्रतिरोधी फसलें और नियंत्रित चराई सभी इसमें सहायक हैं। पेड़ लगाने से मिट्टी स्थिर होती है और पानी का भंडारण होता है। यह काम धीमा और खर्चीला है। सफलता स्थानीय भागीदारी पर निर्भर करती है। जब किसान परिणाम देखते हैं, तो वे इन पद्धतियों को जारी रखते हैं।
मुख्य कारण
- सूखा
- चराई
- वनों की कटाई
- खराब सिंचाई
- जलवायु परिवर्तन
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