तू क्वोके एक ऐसी भ्रांति है जो आरोप लगाने वाले पर ही आरोप लगाकर आलोचना को टाल देती है। आप कहते हैं कि मैं गलत हूँ, लेकिन आप भी गलत हैं। आरोप अप्रासंगिक है। यह मूल आलोचना का समाधान नहीं करता, बल्कि विषय बदल देता है। यह व्यक्तिगत हमले का एक रूप है। इसे पाखंड की अपील भी कहा जाता है।
यह शब्द लैटिन भाषा का है जिसका अर्थ है "तुम भी"। यह भ्रांति अक्सर बहसों में पाई जाती है। एक डॉक्टर मरीज को धूम्रपान छोड़ने की सलाह देता है। मरीज कहता है, आप भी तो धूम्रपान करते हैं। डॉक्टर की आदत का इससे कोई लेना-देना नहीं है। सलाह फिर भी सही है। एक राजनेता पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता है। राजनेता कहता है, दूसरी पार्टी भी भ्रष्ट है। दूसरी पार्टी का भ्रष्टाचार अप्रासंगिक है। आरोप बना रहता है।
Tu quoque examples
- आप कहते हैं कि मुझे व्यायाम करना चाहिए, लेकिन आप स्वयं व्यायाम नहीं करते।
- आप मेरे खर्च की आलोचना करते हैं, लेकिन आप भी तो खर्च करते हैं।
- आप मुझे रीसायकल करने के लिए कहते हैं, लेकिन आप खुद रीसायकल नहीं करते।
- आप कहते हैं कि मैं देर से आया हूँ, लेकिन आप तो पिछले हफ्ते देर से आए थे।
- आप कहते हैं कि मैं पाखंडी हूँ, लेकिन आप भी तो पाखंडी हैं।
तू क्वोके प्रासंगिकता का एक भ्रांति है। आरोप लगाने वाले का पाखंड आरोप की सत्यता को प्रभावित नहीं करता। एक धूम्रपान करने वाला सही कह सकता है कि धूम्रपान हानिकारक है। एक भ्रष्ट राजनेता सही कह सकता है कि भ्रष्टाचार गलत है। संदेश, संदेश देने वाले से अलग होता है। यही सिद्धांत है। व्यवहार में, पाखंड विश्वसनीयता से संबंधित होता है। यदि कोई व्यक्ति अपने ही सुझाव का पालन नहीं करता, तो हम उस पर कम भरोसा करते हैं। लेकिन विश्वसनीयता सत्य नहीं है। आरोप सबूतों पर टिका होता है। तू क्वोके सबूतों को नजरअंदाज करता है। यह आरोप लगाने वाले पर ही हमला करता है। यह ध्यान भटकाने का एक प्रयास है। यह एक भ्रांति है। मूल आलोचना बनी रहती है। उसका उत्तर देना आवश्यक है।
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