नारीवाद कोई एक विचार नहीं है। यह एक आंदोलन है, या यों कहें कि आंदोलनों का एक समूह है, जो लैंगिक समानता की वकालत करता है। इसका उद्देश्य लिंगभेद, लिंग आधारित शोषण और उत्पीड़न को समाप्त करना है। यह शब्द 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रचलित हुआ, लेकिन इसके विचार इससे भी पुराने हैं। मैरी वोलस्टोनक्राफ्ट की 1792 में प्रकाशित पुस्तक में महिलाओं की शिक्षा और तर्कशक्ति की वकालत की गई थी।
नारीवाद के कई चरण होते हैं। पहले चरण के नारीवाद का ध्यान मताधिकार और कानूनी अधिकारों पर केंद्रित था। दूसरे चरण, जो 1960 और 70 के दशक में आया, ने कार्यस्थल पर भेदभाव, प्रजनन अधिकारों और घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों को उठाया। तीसरे चरण, जो 1990 के दशक से शुरू हुआ, ने अंतर्संबंधता पर जोर दिया — यह विचार कि लिंग, नस्ल, वर्ग और यौनिकता एक दूसरे से जुड़े होते हैं। चौथा चरण, जो सोशल मीडिया के कारण संभव हुआ, उत्पीड़न और ऑनलाइन स्त्री द्वेष को लक्षित करता है।
मुख्य चिंताएँ
- समान वेतन और आर्थिक अवसर
- प्रजनन अधिकार और स्वास्थ्य सेवा
- महिलाओं के खिलाफ हिंसा को समाप्त करना
- सौंदर्य मानकों और मीडिया प्रतिनिधित्व को चुनौती देना
- जाति, वर्ग और यौनिकता के आधार पर अंतर्संबंधी न्याय
नारीवाद एकरूप नहीं है। उदारवादी, कट्टरपंथी, समाजवादी, अश्वेत और अंतर्राष्ट्रीय नारीवाद की रणनीति और मुख्य बिंदु भिन्न-भिन्न हैं। इन सभी में एक बात समान है, और वह है लैंगिक अन्याय को समाप्त करने की प्रतिबद्धता।
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