प्रेम ईश्वर और दूसरों के प्रति निस्वार्थ, बलिदानपूर्ण समर्पण है। यह कोई भावना नहीं है। यह कोई मनोभाव नहीं है। यह कोई मनोदशा नहीं है। यह कोई जुनून नहीं है। यह कोई प्रेम प्रसंग नहीं है। यह कोई मित्रता नहीं है। यह कोई परिवार नहीं है। यह कोई समुदाय नहीं है। यह कोई राष्ट्र नहीं है। यह कोई संसार नहीं है। यह कोई ब्रह्मांड नहीं है। यह कोई ईश्वर नहीं है। यह कोई शक्ति नहीं है। यह कोई सिद्धांत नहीं है। यह कोई नियम नहीं है। यह कोई आज्ञा नहीं है। यह कोई शब्द नहीं है। यह कोई नाम नहीं है। यह कोई वस्तु नहीं है। यह कोई व्यक्ति नहीं है। यह कोई प्राणी नहीं है। यह कोई आत्मा नहीं है। यह कोई पिता नहीं है। यह कोई पुत्र नहीं है। यह कोई पवित्र आत्मा नहीं है। यह कोई त्रिमूर्ति नहीं है। यह कोई प्रेम नहीं है। यह प्रेम है। यह ईश्वर है। ईश्वर प्रेम है। यही परिभाषा है। यही सत्य है। यही सुसमाचार है। यही आस्था है। यही आशा है। यही जीवन है। यही प्रेम है।
प्रेम सबसे बड़ी आज्ञा है। अपने पूरे हृदय, आत्मा, मन और शक्ति से परमेश्वर से प्रेम करो। अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो। यही नियम है। यही भविष्यवक्ताओं का संदेश है। यही सुसमाचार है। यही मसीही जीवन है। यही पवित्र आत्मा का फल है। प्रेम धैर्यवान और दयालु होता है। प्रेम ईर्ष्या या घमंड नहीं करता। यह अभिमानी या असभ्य नहीं होता। यह अपनी बात मनवाने की ज़िद नहीं करता। यह चिड़चिड़ा या नाराज़ नहीं होता। यह कुकर्म पर प्रसन्न नहीं होता। यह सत्य में प्रसन्न होता है। प्रेम सब कुछ सहता है। सब कुछ मानता है। सब कुछ आशा करता है। सब कुछ सहन करता है। प्रेम कभी समाप्त नहीं होता। यही 1 कुरिन्थियों 13 है। यही प्रेम का अध्याय है। यही परमेश्वर का प्रेम है। यही मसीह का प्रेम है। यही पवित्र आत्मा का प्रेम है। यही कलीसिया का प्रेम है। यही संतों का प्रेम है। यही उद्धार पाए हुओं का प्रेम है। यही स्वर्गदूतों का प्रेम है। यही स्वर्ग का प्रेम है। यही परमेश्वर का प्रेम है। यही प्रेम है।
धर्मग्रंथों में प्रेम
- मत्ती 22:37-39: परमेश्वर और पड़ोसी से प्रेम करो।
- 1 कुरिन्थियों 13: प्रेम धैर्यवान और दयालु होता है।
- 1 यूहन्ना 4:8: परमेश्वर प्रेम है।
- यूहन्ना 3:16: परमेश्वर ने जगत से इतना प्रेम किया।
- यूहन्ना 13:35: एक दूसरे से वैसे ही प्रेम करो जैसे मैंने तुमसे प्रेम किया है।
- रोमियों 5:8: परमेश्वर अपना प्रेम हमारे प्रति प्रकट करता है।
- 1 यूहन्ना 3:16: दूसरों के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दो।
प्रेम सबसे महान है। आस्था, आशा और प्रेम अटल हैं। इन सब में सबसे महान प्रेम है। प्रेम ही आरंभ है। प्रेम ही मध्य है। प्रेम ही अंत है। प्रेम ही मार्ग है। प्रेम ही सत्य है। प्रेम ही जीवन है। प्रेम ही प्रकाश है। प्रेम ही नमक है। प्रेम ही खमीर है। प्रेम ही राई का दाना है। प्रेम ही अनमोल मोती है। प्रेम ही खेत में छिपा खजाना है। प्रेम ही खोया हुआ सिक्का है। प्रेम ही खोई हुई भेड़ है। प्रेम ही भटका हुआ पुत्र है। प्रेम ही नेक सामरी है। प्रेम ही विधवा का दान है। प्रेम ही ठंडा पानी का प्याला है। प्रेम इन सब में सबसे छोटा है। प्रेम ही सबसे महान है। प्रेम ही ईश्वर है। ईश्वर ही प्रेम है। प्रेम ही प्रेम है। प्रेम ही है। आमीन।
Comments
No comments yet. Be the first to share a thought.
Leave a comment