लोहारगिरी लोहे और इस्पात को गर्म करके और हथौड़े से पीटकर आकार देने की कला है। लोहार भट्टी में धातु को तब तक गर्म करता है जब तक वह लाल या पीली न हो जाए। फिर वे उसे निहाई पर हथौड़े से आकार देते हैं। धातु गर्म होने पर नरम और ठंडी होने पर कठोर होती है। लोहार तेजी से काम करता है, क्योंकि काम करने की अवधि बहुत कम होती है। यह कला प्राचीन है। यह कला मेहनत से भरी है। यह कला एक जैसी ही है।
लोहारगिरी में कई तकनीकें शामिल होती हैं। खींचने से धातु फैलती है। दबाने से वह मोटी होती है। मोड़ने से वह घुमावदार बनती है। घुमाने से वह सर्पिलाकार आकार लेती है। छेद करने से धातु के टुकड़े जुड़ते हैं। वेल्डिंग से धातु के टुकड़े जुड़ते हैं। हर तकनीक के लिए अभ्यास की आवश्यकता होती है। हर तकनीक के लिए सही औजार चाहिए। लोहार हथौड़े, चिमटे, छेनी, पंच और फुलर का उपयोग करता है। औजार हाथ का ही विस्तार हैं। हाथ इच्छाशक्ति का विस्तार है। इच्छाशक्ति ही शिल्प है।
लोहार का काम अनेक वस्तुएँ बनाता है। एक लोहार घोड़े की नाल, कब्ज़े, फाटक, औज़ार, चाकू और कलाकृतियाँ बनाता है। लोहार एक वर्कशॉप में काम करता है। भट्टी उसका हृदय है। निहाई केंद्र है। हथौड़ा उसकी आवाज़ है। लोहार एक शिल्पकार है। लोहार एक ही है। आग एक ही है। आग भट्टी है। भट्टी लोहार है। लोहार एक ही है। लोहा इस्पात है। इस्पात शिल्प है। शिल्प एक ही है।
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